शांति

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वो बस से उतरते
करीने से सजे बालों को बिगाड़ता ठंडी हवा का पहला झौंका
कानों में जैसे कोई गीत गूँज पड़ा
बादलों ने काली चादर छोड़ी
सुबह के उगते सूरज की लालिमा नज़र आने लगी
हमनें पगडंडी पकड़ी
और मंज़िल की ओर बढ़ लिए
हवा सर्द हो उठी
हम ठिठुरने लगे
फिर भी यूँ ही आगे बढ़ने लगे
पीछे से गाडी का शोर सुनाई पड़ा
एक भद्रजन ने आवाज़ लगाई
पूछे की कहाँ जाना है
“जहाँ शांति मिल जाये”
हमने कहा।
वो रुके एक किनारे पे
उतरकर अपने करीब आए
सामान हाथ से लेकर पीछे की सीट पर रखा
बैठने का इशारा किया
अक्सर भरोसा नहीं करता था मैं
पर तब न जानें क्यों
बस चल दिया
सुबह थी तो सड़क ख़ाली थी
शहर से निकलने में वक़्त नहीं लगा
एक मोड़ के बाद पहाड़ियां नज़र आनें लगीं
और गाडी ऊँचाई चढ़ने लगी
हवा और ठंडी हो गई
खिड़की नीचे करते ही
पहली छींक आई
अन्दाज़ा हुआ की मौसम से ज्यादा होशियारी ठीक नहीं
जैकेट में सर ढका और खिड़की ऊपर चढ़ा ली
अब सड़क के एक तरफ खाई थी
और दूसरी तरफ पहाड़
जिसका रंग दूरी के साथ बदल रहा था
काले से स्याह, फिर मटमैला
फिर हरा, न जानें कितने ही रंग थे
शीशे से नज़र दौड़ाई तो दूसरी पहाड़ियाँ दिखी
अपनी ऊंचाई से उनके ऊपर के बादल साफ दीखते थे
एक दुसरे से टकराके जैसे अदखेलियां कर रहे हों
एक तरफ सुबह की रौशनी
और दूसरी और इनकी कालिख
फर्क दूर से दीखता था
टकराने के बाद बिखरती बारिश का मंज़र
जो बस वहीँ तक सीमित थी
गाडी यकायक रुकी
मेरे संगी ने अलविदा ली
और मुझे वहां छोड़कर वापस हो गए
एक पथ्थर की बेंच दिखी मुझे
सामान साथ में रखकर बैठ गया
पीछे पहाड़ सामनें बादलों की लड़ाई
नीचे खाई की गहराइयाँ
उनमें दिखाई देती एक झील
उसके साथ बना बाँध
पक्षी भी जैसे समझते हों
आपके आनें का मकसद
इसलिए थोड़े शांत थे
कब वहां बैठे बैठे समय गुज़र गया
पता नहीं चला
जब लौटने का वक़्त हुआ
तो एक वादा कर आये
शायद ।
शायद हम फिर आएंगे।।

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