Source

The parts of me,

They yearn of you

In the heavy hopes,

Some of them,

That languish deep,

In my wounded heart

That feels so immensely

It only rues,

and fights the distance

And still,

There’s a longing,

Unfulfilled,

Unabashed,

Undeterred, and one

That is always found,

feeding on my love and affection,

miserably flouting, and

passionately fanning

The eternal fires,

Those that burn inside

And turn every moment

Into a mountain of blemishes

For the heart seeks,

What it can never find…

And that, my love

is the source of all,

that ails me…

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नई सुबह

आज की सुबह 

कुछ नया लेकर आई थी

कल की शिकन की लकीरें

कहीं खो चुकी थीं

रह गयी थी तो

बस एक ख्वाईश

कि या तो उन्हें

अपने ऊन्स का अहसास करा जाएं

या तो वो अपने ऊन्स में

गिरफ्तार हो जाएं

आसां तो नहीं है

पर इश्क़ है

अब आग के दरिया में

डुबीएगा नहीं

तो तैरना कैसे सीखेंगे

तो बस

खुद से वादा सा कर बैठे

और लौट के बुद्धू घर को आये।

और सोचने लगे

कि ये सुबह

कुछ नई है।।

ये सुबह कुछ

अलग है।।

Maybe

It’s harsh,

You know

To be able to feel

When the other doesn’t 

And you thought,

There was something

For both of us,

But it just

Doesn’t happen

Maybe,

It’s the time,

Which isn’t right

Or maybe,

It’s just us

A lot of maybes

Left unanswered

And the pain

That comes

With that uncertainty

Traverses beyond all pains

That the heart goes through

There’s longing that aches,

Now, from a distance

Too shy to come close,

To awkward to speak,

A load has been lifted,

And, a load has been pushed upon,

All in all,

It’s alright,

If not today,

Then maybe

In the end

Maybe..

Union

So one night

I ask her

I am confused

For I don’t have words

To make her go mad

Or fall in love

Or be smitten

For the least

Things jumble up

Emotions play a tawdry tune

And the heart beckons

Waiting for mind to comprehend

What her eyes say

And make up for the things

That are better left unsaid

And maybe,

Just are better understood

If and only if

The hearts align

And the minds entwine..

And the souls,

Unite..

Emptyness

When my thoughts wander

In the wilderness

that beckons

at the bottom

of my heart

Only your voice

Soothens me up

Makes me pick up the pieces

Broken by the angst

This wounded heart ached for

And it those trying times

Only your thought

Nullifies all the wrong

Done to me

Maybe,

You are the sand

Or water, perhaps

That fills up

The voids in a jar

Laden with stones

And the jar that was proud once,

Is now complete,

And that’s how

You complete me…..

Not Today!

What do you say to her,

When she asks,

“Have you had enough of me?”

Not today! Not today!

What does your heart tell you,

When she walks like a daydream

Turning all your fantasies true

And she asks,

“Have you seen it all?”

Not today! Not today!
You rush back home,

After a hard day’s work

And she looks at you,

With those baby dove eyes

And she means to sit with you,

Spend sometime,

Reading a poem or two, maybe

And she asks,

For she needs to be sure,

“Sugar! Are you tired?”

What would you rather say,

If,

Not today! Not today!

सीख

हम यहां अपने चबूतरे पर बैठे

अखबार के साथ

चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे

पर मन कहीं और मशगूल था

कुछ ताक में थे हम शायद

जानें किस उधेड़बुन में थे

कि अचानक नज़र गयी

दूर एक पहाड़ी पर

कुछ चरवाहे घाटी की तलहटी से

ऊपर की ओर जाते दिख रहे थे

कुछ भेड़ बकरियां उनके आगे

कतारबद्ध थी

वो भी आवाज़ करते हुए

बढ़ी जा रही थीं

सुबह की मीठी मीठी ठंडी पुरवाई

तन को झकझोड़ रही थी

आलस टूटने का नाम न लेता था

और हमारी चाय की चुस्कियां

उनकी चाल के साथ साथ तेज होने लगी थीं

और माथे पे शिकन बढ़े जा रही थी

फिर एक मेमना

कुलांचे भरता हुआ

झुंड से अलग जानें लगा

उन चरवाहों के बच्चों में से भी

एक बच्चा उसके पीछे पीछे हो लिया

भेड़चाल ही समझो

पर किसी ने ध्यान नही दिया उस तरफ

क्योंकि उसने दो उपर की ओर जाने वाली पगडंडियों में से

एक खड़ी चढ़ाई वाली पगडंडी पकड़ ली थी

दूर से बैठ मैं ये सोच रहा था

ये दोनों बच्चे ऊपर सही सलामत पहुंचेंगे कैसे

ऊपर जाते जाते रास्ता दुर्गम होता दिख रहा था

मैंने सोचा आवाज़ लगाऊं

पर दूरी इतनी थी

कि पहुंचेगी नहीं तय था

मन व्याकुल था

ऊपर आसमान में भी

काले बादल बुरे काले साये की तरह

लहराने लगे थे

बिजली तो जैसे बस उनकी

फ़िराक़ में थी जैसे

कि नज़र पड़ते ही

शेरनी की जैसे

टूट पड़ेगी उनपर

उम्मीद कम थी

पर बच्चे अविरल थे

हौंसले उनके चट्टानों से भी बुलंद

निडर बेख़ौफ़

वो ऊपर बढ़े जा रहे थे

शिकन क्या होती है

पता न था

कुछ अलग था उनमें

जो इंसान गवां देता है

आपाधापी में, ज़िन्दगी की

शिखर शिखर नहीं

एक खेल भर था

और ज़िन्दगी ज़िन्दगी नहीं

एक मंज़िल भर थी

जो शिखर के ऊपर

उनके ईंतज़ार में

पलखपाँवड़े डाले जुटी खड़ी थी

कि ये चट्टान तोड़

ज़मीन से फूटेंगे

और वो

लव कुश की तरह

इन्हें आलंगनबद्ध कर लेगी

अजीब दृश्य था

अजीब वाक्य था

पर उसमें भी लगा कि

कुछ सीख दे रही हो जैसे ज़िन्दगी

वो बचपन की निडरता

वो छोटे छोटे सपने

जिन्हें पूरा करना ही मक़सद था

उसी में ही दुनिया सिमट जाती थी

फिर बड़े होते होते

दुनियादारी की लत लग जाती है

और अपनी मंज़िलें छोड़

दूसरे की तकलीफें बढ़ाने में

ज़्यादा ख़ुशी होती है

और एक ये हैं

जो पल पल में ही

ज़िन्दगी की अहमियत

बयान करे जाते हैं

सोचा कि शायद

इंसान कद से तो बड़ा हो चुका है

पर अपनी सीखें पीछे छोड़ आया है

लगता है जैसे इंसान वक़्त से पहले ही

अपनी आत्मा छोड़ चुका है

पर चलना काम है

इसलिए बस यूं ही

एक जगह खड़ा है

आगे बढ़ने में तकल्लुफ है

तो यूँ ही पतझड़ में

ठूंठ बना खड़ा है।

अपनी सीखें पीछे छोड़ आया है शायद।।