Loveless

I guess

I need a different kind of love

One that doesn’t runaway

After realising

What a bad patchup job I am

Stitchted together

With broken shards

Waiting to fall out of

Rather the one

Who appreciates the broken

And whose broken shards

Fuse with mine

And make one complete being

I need that kind of love..

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असली हँसी

ख्वाइशों के बोझ तले दफ़्न

एक हल्की सी चीख

कानों तक पहुंचती है

पल भर में ही वो जैसे

गाथा अपनी कह जाती है

मेरी ही गाथा थी वो

पर अब अपनी सी लगती नहीं

फिर न जानें क्यों

खुद से कहता हूं मैं

की तेरी कोई गलती नहीं

दब जाती है फिरसे वो

सही गलत के फेर तले

जुट जाता हूँ मैं फिरसे

कि मेरा व्यापार चले

चाहत दम तोड़ती रहती हैं

दिल के वीरानों में

जब ख़्वाइशों को नज़रबंद किया

अंधेरों के तहखानों में

पल पल घुट घुट मरता हूँ

पर उफ़्फ़ तक न करता हूँ

मैंने जीना सीख लिया है

हँसता नक़ाब ढाँप लिया है

पर कभी कभी जब मैं

अपने अक्स से मिलता हूँ

तो अक्सर सोचता हूँ

कि शायद थोड़ी हिम्मत होती

तो शायद हँसी असली होती।।

Undoing

That constant erosion

Of that thin sanity

Left fighting somewhere

With them unexorcised demons of the past

And the future,

That beholds more pain

Than the healing it can bestow

And I wonder,

If I really want

To lie in the present

Or just melt away

Or vaporise

Just like these salt waters

That have made a slight stop

At the depth of my eyelids

I don’t want to let go of them

For I continue to live in ambiguity

And these waters,

They hold my precious being captive

Unable to let go of the past

Resistant to forego the pains in the present

And look beyond

What the future may unfold

What a quagmire I am in

All the fruits of my own undoing..

वो

कुछ अलग थी वो

इस जहाँ की तो नहीं थी

उसका होना जैसे एक सबूत था

उस जहाँ की मौजूदगी का

जहाँ किसी आडम्बर की जगह नहीं

इंसान जो चाहता है

वो करता है

बेखौफ्फ़ बेझिझक

किसी दूसरे की खुशी से ईर्ष्या की वहां कोई जगह नहीं

बस उसी जहां से थी वो

आम लड़कियों की तरह लंबे बाल न थे

बस कान तक सलीके से सवांरी हुई ज़ुल्फें

हल्का सा सुबह का सूरज जैसे अपनी किरणों की कुछ रंगत

उसकी उन्हीं ज़ुल्फ़ों के बीच छोड़ गया हो जैसे

ऐसे चमकती थी वो

सर्दी की खुशनुमा धूप में

खुश्की से लाल हुए गाल जैसे 

मेरे हाथों की गर्माहट ही टटोल रहे हों 

और उसका वो दादी का बुना हुआ ऊनी स्वेटर

जो पूरी सर्दी उसके बदन से उतरता नहीं था

क्योंकि ठंड से मुकाबले की हिम्मत

दादी का प्यार दे जाता था

और अंगूर की बेलों की तरह फैलते

और मुझे समा जाने को उत्सुक उसके रेशम सी मुलायम बांहें

जो बस मेरे लिए बेसब्र थीं

हर लम्हा बस मुझे ढूंढती रहती थीं

उसके घर की चौखट पे आंखें लगाए

जब मिलती थी

तो मन मे बवंडर से उठते थे

जिन्हें दबाना शायद वही जानती थी

बस एक मंद मुस्कान ही काफी थी उसकी

The Pain of Being Lonely

It’s a long and tiring road

While on your way back

To where you belong

A day’s hardships

Seem to melt away

With a dark gloomy sky

Coaxing out the emotions

Pent up inside of you

Waiting to be excavated

But there isn’t any

Just a dull bucket full of disappointment

And a bit of regret

Not at things that were

Or the people who made your life

What it used to be

You regret the times

That makes these people fade away

And leaves behind

A cloud of self pity, loathing

And then questions,

Unanswered, as always

And the loneliness,

That comes scratching

In the confines of the darkness

You are shackled in

Uneasy to break away from

But then, you could see

The light at the end of the tunnel

However far, it maybe

You will get through this,

You exclaim!

Alas! there was a little help

It just wasn’t much

Just someone to push you through

Or end this melancholia

And sit through

And fill the voids

Left with the pieces that crumbled away

And you stood there 

Lonely and dumbstruck

Never to be whole again..

हवा

यह हवा

यह हवा बड़ी बेसब्र है

पहाड़ों से होकर गुजरती है

तो बर्फ की नमी सोख लेती है

रह जाती है तो बस बेजान बर्फ

कठोर और नीरस

जो न मन को हर्षित करती है

न आंखों की चमक बढ़ाती है
सब इस हवा की करामात है

यह वही हवा है

जो पहाड़ों की नमी लिए हुए

ठंड सर्द रातों की कपकपी बढ़ाती हुई

कमज़र्फ बेहूदा हवा ।
हम तन्हाई में दो पल

अकेला बिताने क्या निकल पड़े

डकैत की माफिक आयी

और चुपके से पीछे से

चेहरे पर यूँ छपाक से हमला कर दिया

नामाकूल हवा ।
गालों पर जैसे ओस ने डेरा जमा लिया

बर्फ की तरह वो भी जमने लगे

सोचा जैकेट की गर्माहट में दबे

हाथ निकालकर सहला लें

पर हाथों का सुकून खत्म करने का इरादा न हुआ

बेशर्म हवा।
इतना होब3 ओर भी रुकी नहीं

सर्दी के पारे को किसी अंधे कुएं

में आज ही गिराकर मारने का संकल्प ले रखा है जैसे

सांय सायं करती हुई

निर्विरोध निर्विघ्न अविरल

बहती रही

पर जब ढांढस का बांध टूट पड़ा

तो आंखें खोजने लगीं तुम्हें

तो तुम्हें गए हुए तो अरसा हो गया

तुम्हें देखे हुए तो अरसा हो गया

सर्द ही सही, ओर ये हवा

तुमसे मेरे रिश्ते की गर्माहट का

अहसास करा गयी

मदमस्त हवा ।।

वक़्त

बहुत कुरेदा खुद को आज

कुछ सवाल थे खुद से

जवाब कहीं और मिला नहीं

वक़्त बीता तो समझे

कि जवाब यहीं कहीं है

बस शायद

नाउम्मीदी की जो धूल

पहाड़ बनकर इरादों पर

बोझ बनकर बैठी है

गले की फांस हो जैसे

न आवाज़ निकलती है

न दर्द बयाँ होता है

आह भी बस

मन मसोसकर खुद अपना गाला घोट लेती है

असलियत से वाकिफ है

अच्छा है

एक यही है जो

धुत्कारती नहीं

जवाब मिले एक अरसा बीत गया

इतना की सवाल भूल बैठे

अब सोच में है

कि न रास्ता याद है

न मंज़िल का अतापता कुछ है

रुक कर कुछ पूछ ही लें किसी से

पर वक़्त

वक़्त तो सोने से भी महँगा जान पड़ता है

मिलता ही नहीँ

न कोई देकर राज़ी है

बस यूँ ही

मशीनों की तरह

गिनते गिनते वक़्त की तलाश में

वक़्त गुज़ार देते हैं लोग

अजीब इत्तेफ़ाक़ ही है

आज वहीं खड़े हैं

जहां काल तक बस 

एक कोने में खड़े होकर

लोगों पर फब्तियां कसा करते हैं

सही है

वक़्त सबका आता है।

क्या इत्तेफ़ाक़ है।।