वो

कुछ अलग थी वो

इस जहाँ की तो नहीं थी

उसका होना जैसे एक सबूत था

उस जहाँ की मौजूदगी का

जहाँ किसी आडम्बर की जगह नहीं

इंसान जो चाहता है

वो करता है

बेखौफ्फ़ बेझिझक

किसी दूसरे की खुशी से ईर्ष्या की वहां कोई जगह नहीं

बस उसी जहां से थी वो

आम लड़कियों की तरह लंबे बाल न थे

बस कान तक सलीके से सवांरी हुई ज़ुल्फें

हल्का सा सुबह का सूरज जैसे अपनी किरणों की कुछ रंगत

उसकी उन्हीं ज़ुल्फ़ों के बीच छोड़ गया हो जैसे

ऐसे चमकती थी वो

सर्दी की खुशनुमा धूप में

खुश्की से लाल हुए गाल जैसे 

मेरे हाथों की गर्माहट ही टटोल रहे हों 

और उसका वो दादी का बुना हुआ ऊनी स्वेटर

जो पूरी सर्दी उसके बदन से उतरता नहीं था

क्योंकि ठंड से मुकाबले की हिम्मत

दादी का प्यार दे जाता था

और अंगूर की बेलों की तरह फैलते

और मुझे समा जाने को उत्सुक उसके रेशम सी मुलायम बांहें

जो बस मेरे लिए बेसब्र थीं

हर लम्हा बस मुझे ढूंढती रहती थीं

उसके घर की चौखट पे आंखें लगाए

जब मिलती थी

तो मन मे बवंडर से उठते थे

जिन्हें दबाना शायद वही जानती थी

बस एक मंद मुस्कान ही काफी थी उसकी

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The Pain of Being Lonely

It’s a long and tiring road

While on your way back

To where you belong

A day’s hardships

Seem to melt away

With a dark gloomy sky

Coaxing out the emotions

Pent up inside of you

Waiting to be excavated

But there isn’t any

Just a dull bucket full of disappointment

And a bit of regret

Not at things that were

Or the people who made your life

What it used to be

You regret the times

That makes these people fade away

And leaves behind

A cloud of self pity, loathing

And then questions,

Unanswered, as always

And the loneliness,

That comes scratching

In the confines of the darkness

You are shackled in

Uneasy to break away from

But then, you could see

The light at the end of the tunnel

However far, it maybe

You will get through this,

You exclaim!

Alas! there was a little help

It just wasn’t much

Just someone to push you through

Or end this melancholia

And sit through

And fill the voids

Left with the pieces that crumbled away

And you stood there 

Lonely and dumbstruck

Never to be whole again..

हवा

यह हवा

यह हवा बड़ी बेसब्र है

पहाड़ों से होकर गुजरती है

तो बर्फ की नमी सोख लेती है

रह जाती है तो बस बेजान बर्फ

कठोर और नीरस

जो न मन को हर्षित करती है

न आंखों की चमक बढ़ाती है
सब इस हवा की करामात है

यह वही हवा है

जो पहाड़ों की नमी लिए हुए

ठंड सर्द रातों की कपकपी बढ़ाती हुई

कमज़र्फ बेहूदा हवा ।
हम तन्हाई में दो पल

अकेला बिताने क्या निकल पड़े

डकैत की माफिक आयी

और चुपके से पीछे से

चेहरे पर यूँ छपाक से हमला कर दिया

नामाकूल हवा ।
गालों पर जैसे ओस ने डेरा जमा लिया

बर्फ की तरह वो भी जमने लगे

सोचा जैकेट की गर्माहट में दबे

हाथ निकालकर सहला लें

पर हाथों का सुकून खत्म करने का इरादा न हुआ

बेशर्म हवा।
इतना होब3 ओर भी रुकी नहीं

सर्दी के पारे को किसी अंधे कुएं

में आज ही गिराकर मारने का संकल्प ले रखा है जैसे

सांय सायं करती हुई

निर्विरोध निर्विघ्न अविरल

बहती रही

पर जब ढांढस का बांध टूट पड़ा

तो आंखें खोजने लगीं तुम्हें

तो तुम्हें गए हुए तो अरसा हो गया

तुम्हें देखे हुए तो अरसा हो गया

सर्द ही सही, ओर ये हवा

तुमसे मेरे रिश्ते की गर्माहट का

अहसास करा गयी

मदमस्त हवा ।।

वक़्त

बहुत कुरेदा खुद को आज

कुछ सवाल थे खुद से

जवाब कहीं और मिला नहीं

वक़्त बीता तो समझे

कि जवाब यहीं कहीं है

बस शायद

नाउम्मीदी की जो धूल

पहाड़ बनकर इरादों पर

बोझ बनकर बैठी है

गले की फांस हो जैसे

न आवाज़ निकलती है

न दर्द बयाँ होता है

आह भी बस

मन मसोसकर खुद अपना गाला घोट लेती है

असलियत से वाकिफ है

अच्छा है

एक यही है जो

धुत्कारती नहीं

जवाब मिले एक अरसा बीत गया

इतना की सवाल भूल बैठे

अब सोच में है

कि न रास्ता याद है

न मंज़िल का अतापता कुछ है

रुक कर कुछ पूछ ही लें किसी से

पर वक़्त

वक़्त तो सोने से भी महँगा जान पड़ता है

मिलता ही नहीँ

न कोई देकर राज़ी है

बस यूँ ही

मशीनों की तरह

गिनते गिनते वक़्त की तलाश में

वक़्त गुज़ार देते हैं लोग

अजीब इत्तेफ़ाक़ ही है

आज वहीं खड़े हैं

जहां काल तक बस 

एक कोने में खड़े होकर

लोगों पर फब्तियां कसा करते हैं

सही है

वक़्त सबका आता है।

क्या इत्तेफ़ाक़ है।।

Love

On a cold december night

I yearn 

For the warmth

Of a radiant heart

Brimming with emotions

To nudge me

To sleep

Sing me a lullaby

When my body is exhausted

And her tender touch

Seems to melt all the pain away

And I pass in a slumber

Ever so deep

That is too dreamy to be true

And too long to be realistic

And when I wake up

I miss that urge

So subtle it used to be

To rush for that phone

Hurriedly reading through the texts

As if, expecting something

End up smiling,

If there was any surprises,

If not, then 

Sending a little something their way

Just to see them smile

Or yet,

That naive attempt to woo

And when I come to my senses,

Where I am today,

I miss it

I miss

What it is,

That you call

That thing called Love..

Afterthought

It’s a curse, really

That the one that doesn’t emote

Implodes between the layers

Of that prudent reserve

Never giving away

The pain beneath

And the other believes

That he doesn’t care

He does, though

But can the other read

What the eyes give away

That is the question

And the root of all there is

That is left,

Unanswered

Never to be spoken of

Never to be talked about

A painful goodbye

A sense of an ending

Deprived of closure

And a hackneyed lot of prayers

Silenced abruptly..

बातें


लोग कहते हैं
खंडरों में कुछ बस्ता नहीं

पर शायद

गुमाँ नही उन्हें

इनकी भूली बिसरी

आधी अधूरी टूटी फूटी

दीवारों के बीच

खिलखिलाती जोड़ियों की आशिक़ी

धूप से थककर

सुकून की तलाश में बेचैन

राही का सुकून

और एक और चीज़ है

जो खास है

पुराने दोस्तों की बातें

जो आफ़िस के चक्कर

और वक़्त की ठोकरों में

न जानें कहाँ गुम हो गयी थी

और अब यहाँ

खुदबखुद मिल गयीं

बसी थी कहीं किसी वीरान कोने में

इसी खंडर के

गुम हो गयी थी शायद

पर मिलकर लगा

कुछ है इस जगह में

जो एक लाश में भी जान भरने

जैसी कूवत है इसमें

कुछ है जो 

इसकी दीवारों से सटी

धूप से अठखेलियां करती परछाइयां

और पुराने पीपलों की छांव

मन को भावविभोर कर जाती है

झकझोड़ सा देती है

जैसे कुछ कहना चाहते हों

ये हमसे

और कह न पा रहे हों

बेजुबां जो ठहरे

बस अपने अकेलेपन

की यूँ नुमाइश किये जाते हैं

इस उम्मीद में कि शायद

ये मेहरबां फिर आएंगे

शायद।।