बातें


लोग कहते हैं
खंडरों में कुछ बस्ता नहीं

पर शायद

गुमाँ नही उन्हें

इनकी भूली बिसरी

आधी अधूरी टूटी फूटी

दीवारों के बीच

खिलखिलाती जोड़ियों की आशिक़ी

धूप से थककर

सुकून की तलाश में बेचैन

राही का सुकून

और एक और चीज़ है

जो खास है

पुराने दोस्तों की बातें

जो आफ़िस के चक्कर

और वक़्त की ठोकरों में

न जानें कहाँ गुम हो गयी थी

और अब यहाँ

खुदबखुद मिल गयीं

बसी थी कहीं किसी वीरान कोने में

इसी खंडर के

गुम हो गयी थी शायद

पर मिलकर लगा

कुछ है इस जगह में

जो एक लाश में भी जान भरने

जैसी कूवत है इसमें

कुछ है जो 

इसकी दीवारों से सटी

धूप से अठखेलियां करती परछाइयां

और पुराने पीपलों की छांव

मन को भावविभोर कर जाती है

झकझोड़ सा देती है

जैसे कुछ कहना चाहते हों

ये हमसे

और कह न पा रहे हों

बेजुबां जो ठहरे

बस अपने अकेलेपन

की यूँ नुमाइश किये जाते हैं

इस उम्मीद में कि शायद

ये मेहरबां फिर आएंगे

शायद।।

Advertisements

एहसास

कुछ रूठा रूठा सा आसमान

कुछ सिकुडती सी ज़मीन

कुछ बिलखते से बादल

कुछ आंखों की नमी

ज़ुबाँ कुछ उगलती नहीं

पर गम से वाकिफ़ हर कोई

बस उन्हें ही ख़बर नहीं

पर हमें गिला भी नहीं

इश्क़ फुरसत से

और शिद्दत से हुआ करता है

ज़ोर ज़बरदस्ती से नहीं।।

Note to Self

The err of it

Begins with the fact

That I feel too much

So much that a fear creeps up

Snuggles up against the wall

Inside my heart

And pulls it with a rope

Tied against a nail

Etched innit

The fear

Of feeling so much of it all

And all that at once

And that too

Too soon

Brings a bit of both

Merry and melancholia

And the uncertainty,

Of when, why

And how,

Makes it all the more delightful

For even you don’t know

Which way,

Your fate

Is going to turn

All you can do

Is be optimistic

So much so, that

Even if it turns upside down,

You don’t end up

Drowning in that well

Which you almost,

Almost dig for yourself

That’s the only thing

I’ll tell myself today..

The Social Love

The problem

With love

In this social age

Is how it begins

Like the onset of spring

With those incorrigible rainshowers

Ones that never stop bursting 

Out of that dark cloud

And have every intention

To wet your insides

And leave you vulnerable

With a bit of ecstasy

Mingled with an overflow of emotions

It begins with too much ease

Unexpected, pacing, and 

Grunting heavily,

As it gains up on you

Like that creepy witch

Sneaking up on you

Trying to catch you unawares

And bring you down

And push you,

To the depths of your despair

At that fine opportune moment

When you stop listening

Or paying heed,

To what your mind says

Because you are smitten, already

And when the push comes to shove

You have a hard time

Biting the reality

Coming to terms with the harsh truth

It isn’t easy

And it happens

And it’s nobody’s fault really

It’s just that

Sometimes, rather

Most of the times,

In this world,

People are at a loss,

About how to love,

Or they have forgotten,

What is feels,

To be loved

Maybe, 

It’s the celebratory romances,

That have overpowered the truths

That you and I,

Might face, out here

In this world,

Maybe we aren’t inclined to last,

But whatever the age maybe,

I wouldn’t want anybody to feel

What I feel tonight,

What it is to love

And what it is to have lost

I am sad, today

But here’s hoping,

That this too,

Shall pass..

Maybe..

Voice

It wasn’t something

That I wasn’t aware about

It had happened before

It just became clear

My words were my biggest adversary

They could speak

A thought different ways

And mean,

Which I never could

And I probably,

Never would

Because words,

Is how an introvert speaks

Words are,

My voice..

मंज़िल

न जाने क्यों

रुख मोड़ कर

यूँ झुकी झुकी सी नज़रें लिए

मुह फेर कर

खड़ी है ज़िन्दगी

आंसू सूख कर सफेद हुए गाल भी

शायद मेरे स्पर्श को आतुर हैं

पर मुझसे खफा है

आज ज़िन्दगी

न जाने क्यों
पीछे कदम करता हूँ

तो आवाज़ गूंजती है उसकी

पलट के देखूं 

तब तक

ओझल हो चुकी थी ज़िन्दगी

एक कतरा गिरा

फुर्सत इतनी थी

कि होठों तक आने से भी

रोका नहीं

थोड़ा दर्द हुआ सीने में

फिर मुड़े

और राह बदल ली

शायद वहीं तक थी

इस मंज़िल की राह

सफर खत्म हुआ

और आगे बढ़ चली 

हमेशा की तरह

अविरल ज़िन्दगी।।

राही

कभी कभी

कवि को जब 

कल्पना का अभाव अखरता है

तो शायद 

ज़िन्दगी ज़िम्मेदारी ले लेती है

परीक्षा से गुज़ारने की

पल दर पल तांता से लगा रहता है

तकलीफें दिक्कतें हौंसले से जैसे

कबड्डी खेलने को उतारू हों

पर एक अकेला हौंसला

कब तक लड़ेगा

और किस किस्से लड़ेगा

है तो फिर इंसान का ही ना

टूट कर बिखर जाता है

फिर सिमटने के लिए

कभी कभी इंसान भी 

गलत दिशा अख्तियार कर लेता है

इस जुगत में

की कोई हमराह मिल जाये

और वो हमें समेट ले

और हम उन्हें

पर सोच के लिए ख्याल अच्छा है

पर असलियत में ऐसा होता नहीं

डूबती कश्ती को किनारे लगाने वाले

अक्सर पहले खुद किनारे ली तलाश में रहते हैं

सो नामुमकिन सा है

ऐसा हमराह मिलना

बेहतर है कि

इंसान राही की जगह डगर ढूंढे

फिर उस राह में कोई मिल जाये

तो फिर और बात है।