The Femme Fatale

On a warm summer morning

She walks in

Like a breathe of fresh mint 

Blowing in my face

And I look at her

With my eyes closed

Trying to fathom

What hit me

And to catch that feel

Of what it was

To be truly touched

By an angel

Her body frail

Her hands soft and tender

Almost baby like

And a bit of sweat turns on her forehead

I walk over and ask

What is that ails her

She turns to me

Her eyes reddened

She turns to her wallet

Grabs a spray out of it

Sprays it all over my face

And I,

I learn a lesson

Curiosity may not have killed the cat

But it almost killed me

इश्क़

एक बार तो कभी ऐसा हो

कि लफ़्ज़ों पर भारी नज़र पड़े

जब ख्वाइश हो तेरी 

या बस यूं ही गफलत ही में

ज़ेहन में तू ही तू उमड़ पड़े

होश हो या तस्सवुर में

तेरी परछाई झलक पड़े

डगर डगर हम आज भी

हर साकी में तुझे

देखने लगते हैं

नशा तो चढ़ता है पर

जुनून कम न होता है

और सामने जब वो आते हैं

तो नयन कराहने लगते हैं

न होठ अपने से लगते हैं

न चेहरा तेरा ही लगता है

पर कल की परछाई सा

एहसास भर हो जाता है

तू आये न आये पर

वक़्त गुज़रना पड़ता है

तू न सही तेरी परछाई को ही

जब अपना बनाना पड़ता है

रंज तो रहता है 

और दर्द भी दिल मे होता है

पर क्या करें ग़ालिब

इश्क़ इश्क़ है

और इश्क़ में सब चलता है।।

सांझ

अभी तो कुछ पल ठहर जा जिंदगी

अभी तो सांझ बाकी है

अभी तो अंडे से निकले ही थे

की वक़्त की आपाधापी में

बचपन गवां बैठे

दूध के दांत छूटे भी न थे

की अपना भोलापन लुटा बैठे

अभी तो यारों से मिले ही थे

और अब उनके चेहरे भुला बैठे

एक ताल में चलते थे जो कदम

थक हारकर व्यर्थ ही ठोकर कहा बैठे

पर अभी वक़्त कुछ बाकी है दोस्त

कुछ पल रुक तो सही

एक बार एक सांस में थोड़ा

हवा की नमी को महकने दे

जेहन में मेरे थोड़ा

अपना यौवन बहकने दे

बीती ताहि बिसार दे

अब तलक फ़ैसला कर

कूकेंगे साथ उस डाल पे अब

सवेरा होगा जहां

न झूलेंगे उस पात पात

गर्त होगा जहां ज़मीन पर

आ थाम ले मेरा दामन

ले चल मुझे उस ओर

शाम जहां ढली नहीं

और रात अभी बाकी है।

ज़िन्दगी तब तलक

इंतज़ार तेरा बाकी है।।

The Crush

I am siting in an authentic Tibetan Cafe in Mcleodganj. My dad and by younger sibling also accompany me. My dad is tired. He wants north indian food, so he waits for us to order, eat and finish up so that we can go somewhere else and let him have something there. He later settles for a lavish serving of ginger garlic fried rice along with a fresh yoghurt fruit salad. We order and wait for this fine Tibetan lady to bring us our beverages. My brother orders an apple beer and me, I order a lemon ice tea. My usual summer time drink. A beautiful young lady walks in. She is obviously not indian. Her skin tone tells me that straight away. She’s dressed in a sea green flowing ankle length gown and carrying a big peach colored shawl over that. That’s how foreigners travel here in India. The freckles on her skin light up as she goes through the extensive Tibetan and Bhutanese menu. Before that i forgot to mention, her arms had those last bit of hairs she might have left out for a long time maybe due to her travel. A little unkempt for some. Maybe it’s just my imagination, but I seem to like her already. Because I like how she kept it purely natural. Every bit about herself spoke volumes. Even the dark brown sandles had no starry flair about them and could easily be termed as unisexual choice, for all I know. Coming back to the lightening in her eyes, she orders Singaporean Fried rice. I was a little taken aback and a little disappointed. I expected her to be a little more open to experience. Maybe it’s just me. But here she is having her own fill. Meanwhile I order a Tibetan Thukpa, Shakem Datse and plain rice. And it turns out nice. Eventually.

कुछ देर ज़िन्दगी।

आज ज़िन्दगी

फुदक कर

मेरी खिड़की पर आन बैठी

और बतियाने लगी

अपना किस्सा लगी सुनाने

पहले कुछ पल हंसती रही

फिर कुछ ठहाके लगाए

फिर कुछ वाक्या याद आया तो

फफकने लगी

एक नन्हें मुन्ने की माफिक

हमने सहलाकर दिलासा दिया

फिर पंख फड़फड़ाने लगी

आंसू तीतर हो गए

मन हल्का हो गया

फिर फुदक कर उड़ चली

किसी और मुहाने की तलाश में

किसी और सहारे की फिराक में

अब कहीं और दस्तक देगी

कुछ किस्से कुछ कहानी

कुछ खिड़कियाँ कुछ आंखें

कुछ अपनी ही माफिक

नज़रे गड़ाए बैठे हैं

उनकी डाल पे कूकेगी

तो बतलायेगी उन्हें

वो उनसे है

उनसे वो नहीं।।

वो

हँसी में उसकी

नशा अफीम का

आंखें टिमटिमाती ऐसे

मानों चांदनी फुट पड़ेगी अभी

बलखाती हवाओं में 

अपनी साँसों की खुशबुएँ भरती

हिचखोले खाते बादलों पे सवार

और काली रात का पूरा रंग अपने आगोश में समेटे

उसकी घुप्प काली ज़ुल्फें

सर्कस के रिंगमास्टर ने हंटर फटकार के

साँसे कैद करली हों अपनी मुट्ठी में

बस कुछ यूं हुआ

एक अरसे के बाद

आंखे बंद हुईं

और उसका चेहरा 

ज़िन्दगी के अंधेरे में उजाला कर गया

ठिठक कर गिर पड़े

तो उठना भी मुनासिब न समझा

ना आंखें झुकी

न दर्द की आह भी निकली

सिसक भर के हमने

एक सपना बुन लिया

उधेड़बुन में हमने

अपने आप से किनारा कर लिया

चल पड़े

उस नई मंज़िल की ओर

खुली आंखों के सपने को

तिनके का सहारा गिन लिया

मन की दीवारों में

जो सुराख थे बाकी

उसकी होटों की चमकान से 

हर सुराख भर लिया

कभी रंज हुआ ज़िन्दगी पर तो

ढूंढ निकाल लेंगे एक हँसी उसकी

और बस उसके ख्याल में

बस यूँही वक़्त गुज़ार देंगे।।

माँ

कहने को तो एक शब्द भर है

पर सोचो तो पूरा संसार इसमें समाया हो जैसे

आज यूँ बैठकर जब मैं सोचता हूँ

तो बस कल की टीस दर्द देती है

और कुछ यादें ज़ेहन में दस्तक देती हुई

आंखों की पुतलियों को चीरकर

बह जाती हैं

तुझसे जुड़ी हुई यादें 

तेरे अब न होने का एहसास करा जाती हैं

और मैं 

सर्दी की किसी स्याह काली रात में 

ठिठुरते ठूंठ सा

बाद सब चुपचाप सह लेता हूं

लाचार जो हूँ

पर इस मन को कैसे समझाऊँ

जो आज भी जून की भीषण गर्मी में

आज भी तेरे आँचल की ठंडक की

आस लगाए बैठा है

पगला जॉन पड़ता है

कभी अति हो जाती है

तो लोग पूछ पड़ते हैं

की क्या हुआ?

अब उन्हें कौन बताये 

की संसार उजड़ चुका है अपना

पर जानकर वो भी नसीहत दे जाते हैं

की भूल जाओ

अब उन्हें कौन कहे

की माँ को भी कभी भूला जाता है।

नासमझ जानकर मैं भी

बात पलट देता हूँ

किसी और दिन कुछ ज़्यादा सुबक लेंगे

इसलिए आज के लिए खुद को सम्हाल लेता हूँ।।